सत्य दर सत्य


एक सांस के साथ जुड़े होते हैं कई आस और उस आस में होती है कामना और विश्वास 


विश्वास जीने का नाम है और उस जीने को 
ज़िन्दगी कहते हैं...


ज़िन्दगी प्यार में है,ज़िन्दगी दुलार में है...ज़िन्दगी त्याग और निसार में है।

ज़िन्दगी चार दिनों का सफ़र, टेढ़ी-मेढ़ी डगर डरावनी राते,झुलसाता दिवस बाधाओं का कहर शामो शहर

मगर चलते रहना है,भूख-प्यास सहते रहना है,ज़ुल्म और अन्याय सहते रहना है ताकी मयस्सर हो सके आराम की छाँव।


मंजिल जहाँ ज़िन्दगी है,प्यार है...प्यार का इकरार है,जहाँ ज़िन्दगी हसीं है,महजबीं और रंगीन है।


जहाँ प्रगति उत्साह के साथ हँसता है..इरादे जहाँ कह-कहे लगाता है,मानवता जहाँ अठखेलियाँ करती हैं....


और 


आदमी जहाँ कहलाता है देवता।


वही चार सांसे,वही चार दिवस,जिसे कहते हैं ज़िन्दगी।


उस हद को सभी पार करना चाहते हैं जिसे कहते हैं "मंजिल"
किन्तु
काम,क्रोध,लोभ,मोह बाधा बनकर रोकती हैं राहें,थामती हैं बाहें


और


ले जाती है उन्हें करके मदहोश उस अंधेर गली में जहाँ होता है नर्क
वहां का आदमी, 


आदमी नहीं


शैतान कहलाता है...


देवता का भ्रम पालने वाला आदमी तब कितना गिर जाता है अपने आप में


जहाँ एहसासे ज़िन्दगी होती है जद्द और आदमी होता है बेजुबान पत्थर.

Comments

Anonymous said…
too good,amazed tht u still continue writing... n tht too so gud!
commendable ,keep up d gud work!
Anonymous said…
Insaan k dono chehron ki viyakhya sahi ki hai aapne....lekin kavi kavi insaan saitan bankar v Gunaho ka devta kahlata hai....Garibo ka masihaa to ban jata hai...pr kamiyab insaan nhi ban pata hai....
Anonymous said…
Insaan k dono chehron ki viyakhya sahi ki hai aapne....lekin kavi kavi insaan saitan bankar v Gunaho ka devta kahlata hai....Garibo ka masihaa to ban jata hai...pr kamiyab insaan nhi ban pata hai....

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