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HAPPY NEW YEAR 2011 वर्ष जाने को है...ये पल भी बीतने को है...कुछ पल और...सारी यादें समेटे..कुछ खट्टे कुछ मीठे...कुछ हंसी कुछ ग़म... इस पूरे साल में हमने क्या खोया? क्या पाया? कोई हिसाब नहीं करना चाहता.. सब डूबे हैं मस्ती के उस रंग में और न्यू इयर पार्टी की तयारी ज़ोरों पर है.... कोई मय से प्यास बुझाने की तैयारी में है... तो कोई केक काट कर... कोई घूम कर, कुछ सिनेमा हॉल की इर्द गिर्द हैं... तो कहीं प्रेमी प्रेमिका के साथ समय बीता रहे हैं.. लेकिन उस आदमी का क्या जिसके लिए दिवाली, दशहरा, इद्द, क्रिसमस सभी त्योहार एक से हैं...दो जून की रोटी की हुज्जत्त में इन्हें ये याद भी नहीं रहता कि त्यौहार भी है...ऐसा नहीं है कि इनके अरमान नहीं है...यह भी चाहते हैं कि इन्हें भी तोहफे मिले...इन्हें भी कोई प्यार करे..लेकिन इतने मस्त हैं सब आज अपनी अपनी दुनिया में कि भूल कर भी इन्हें कोई याद नहीं करना चाहता.  यहाँ मेरे लिखने का अर्थ यह नहीं है कि आप सभी अपनी ज़िन्दगी में ये पल ना जीयें लेकिन इन् पलों में अगर ये भी शामिल हो जाएँ तो क्या बुराई है??? दरअसल कुछ वा...

लोग कहते हैं ......

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लोग कहते हैं ...... एक पुरानी सी डायरी में .. एक मिटता सा नाम है . लोग कहते हैं वो तुम हो एक अँधेरी सी गली में .. एक गूंजता सा नाम है ... लोग कहते हैं वो तुम हो  एक पागल से लड़के के हाथो में एक धुंधली सी रेखा है …….. लोग कहते हैं वो  तुम हो एक बच्ची सी लड़की के पीछे एक मरुरे सी माया है …… लोग कहते हैं वो तुम  हो हमारे क्लास की कबर्ड में . एक पुराना सा कार्ड है ………. लोग कहते हैं वो तुम हो मेरी डेस्क पर एक तराशा सा नाम है . लोग कहते हैं वो तुम हो …… मेरी पुरानी किताबों में रखा …. एक सूखा सा गुलाब है………… लोग कहते हैं वो तुम हो … मेरी छोटी-छ...

यूं ही.......

आज यूं ही लिखने का मन किया  कुछ खास नहीं न ही कुछ आम बस इस भाग दौड़ भरी ज़िन्दगी से कुछ लम्हे चुराने का मन किया  लिखने के लिए विषय बहुत से हैं लेकिन लिखने भर से क्या सब ठीक हो जाएगा ?? क्या उन् घर के नल्को में पानी आ जायेगी? क्या उन् प्यासी सूरतो में वो हंसी आ जाएगी ? शायद नहीं..... लेकिन फिर भी लिखना मेरी नियति है और  एक सोच शायद ये परिदृश्य बदल जाए शायद.... और जिस दिन ये बदल जाएगा  उस दिन मेरा लिखना कुछ काम आ जायेगा रातो को जागकर सुबह लिखना  कुछ पलों को अपनी डायरी में उकेरना  शायद...जी हाँ शायद...

सोच

जिस्म का दिल से अगर वास्ता नहीं होता कसम खुदा की कोई हादसा नहीं होता. वे लोग जाएँ कहाँ बोलिए खड़े हैं जो  उस हद्द के बाद जहाँ रास्ता नहीं होता सूने कमरे में कैलेंडर सा फड़फड़ाता है  वह दर्द जिसका कोई हमज़बाँ नहीं होता  सिर्फ चेहरा ही नहीं शकसियत भी पहचानो जिसमे दिखता है वही आइना नहीं होता सुना है हमने शोर में,शहर के लोगो से जहाँ अनुराग नहीं वहां काफिला नहीं होता.

आकान्च्छा

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देखता हूँ राह तेरा रोज़ रात आओगे परियों की देश की तुम कहानियां सुनाओगे धीरे-धीरे चुपके चुपके मीठी मीठी लोरियों से  गीतों का गुंजन कर,गीत तुम सिखाओगे. हलकी-हलकी थाप देकर लोरियों की लाये पर ही सच्ची-झूठी ख्वाबों की निदियाँ तुम लाओगे हफ्ते-दिन बीत गए आँखों ही आँखों मै खट्टे-मीठे सपनो की झाड़ियाँ न लाओगे बार-बार कतराकर  बादलों की ओटों मै इठला कर तड़पाकर लुक चिप जाते तुम अब चन्दा आ जाओ मन को तडपाओ मत सपनो की दुनिया में मुझको ले जाओ तुम.  A.Bhattacharya

विश्वास

छंद सिसकता रहा तो काव्य का इतिहास जी जाएगा प्रणय तड़पता रहा तो प्रणय का विश्वास जी जाएगा  पल्लव अगर गिरता रहा,इक दिन मधुमास बनकर रह जाएगा  पर विश्वास ही मरता रहा तो  इंसान ही मर जाएगा

रूप की व्याख्या

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रूप की व्याख्या आवाज़ थी........... विधि का एक खूबसूरत खिलौना  नहीं-नहीं  कल ही सुना है रूप विधि का नहीं ज़माना  खीचने का एक चुम्बकीय ध्रुव है

सत्य दर सत्य

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एक सांस के साथ जुड़े होते हैं कई आस और उस आस में होती है कामना और विश्वास  विश्वास जीने का नाम है और उस जीने को  ज़िन्दगी कहते हैं... ज़िन्दगी प्यार में है,ज़िन्दगी दुलार में है...ज़िन्दगी त्याग और निसार में है। ज़िन्दगी चार दिनों का सफ़र, टेढ़ी-मेढ़ी डगर डरावनी राते,झुलसाता दिवस बाधाओं का कहर शामो शहर मगर चलते रहना है,भूख-प्यास सहते रहना है,ज़ुल्म और अन्याय सहते रहना है ताकी मयस्सर हो सके आराम की छाँव। मंजिल जहाँ ज़िन्दगी है,प्यार है...प्यार का इकरार है,जहाँ ज़िन्दगी हसीं है,महजबीं और रंगीन है। जहाँ प्रगति उत्साह के साथ हँसता है..इरादे जहाँ कह-कहे लगाता है,मानवता जहाँ अठखेलियाँ करती हैं.... और  आदमी जहाँ कहलाता है देवता। वही चार सांसे,वही चार दिवस,जिसे कहते हैं ज़िन्दगी। उस हद को सभी पार करना चाहते हैं जिसे कहते हैं "मंजिल" किन्तु काम,क्रोध,लोभ,मोह बाधा बनकर रोकती हैं राहें,थामती हैं बाहें और ले जाती है उन्हें करके मदहोश उस अंधेर गली में जहाँ होता है नर्क वहां का आदमी,  आदमी नहीं शैतान कहलाता है... देवता का भ्रम पालने वाला आदमी...