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Showing posts from April, 2012
उसकी ख्वाइश है की आंगन में उतरे सूरज। भूल बैठा के खुद मोम का घर रखता है।।
उमर इतनी तो अता कर मेरे फन का मालिक। मेरे दुश्मन मेरे मरने की खबर को तरसे।।
साभार- प्रवीण खारीवाल 
ई टीवी 
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तू है सूरज तुझे रात का कहा मालूम । तू किसी रोज़ उतर मेरी घर में शाम ढल जाने के बाद।।
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ग़ैरों से एहतियात के आलम का ज़िक्र किया । खुद बचकर अपने-आप से चलता रहा हूँ मै।।
वो बचपने की नींद तो अब खवाब हो गई। क्या उम्र थी की रात हुई और सो गए ।।
कोई तुम तक पहुच नहीं पाता। इतना आसान है पता तुम्हारा।।
गर न हो सूरत तो सीरत ही सही । कुछ तो होना चाहिए इन्सान में ।।
सच की लड़ाई आसन भले ही न हो। सच की लड़ाई में जीत आपकी भले ही ना हो ।। ल्व्किन सच कभी हारता नहीं और, मन बोझिल भी नही करता ।।
इश्क से पूछ हुस्न का रुतबा। हुस्न परवरदिगार होता है।।
सिसकता दिल है मगर मिलता हूँ हर एक से हंसकर। यही तो फन है जो आया है बहुत कुछ खो जाने के बाद।।